नारी हू में मैरी व्यथा सुनो
अब ना मुझपे अत्याचार करो...
कभी दहेज तो कभी निर्बल असहाय समझकर कर मत तुम मेरा दोहन करो,
नारी हू में मैरी व्यथा सुनो....
कभी दुष्कर्म तो कभी दुराचार कर मत तुम मेरा अपमान करो,
नारी हू में मैरी व्यथा सुनो....
बहुत उठा लिया तूने मेरी ममता और करुणा का फायदा ,
नारी हू में निर्बल नहीं असहाय नहीं....
मैं हू दुर्गा, काली और लक्ष्मी का रूप
याद करो उस महा विनाश को जब मै लती ज्वाला रूप , कर देती दुष्टो का संहार मैं
नारी हू में मैरी व्यथा सुनो.....
दे नहीं सकते हो सम्मान मुझे तो अपमान भी मेरा मत करना वरना हाल बुरा होगा ये भी किसे से में कहना,
नारी हू में मैरी व्यथा सुनो....
लेखक- मुकुंद मल्होत्रा
©m.m
M