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निर्धन

नियती की नीयत साफ है,
निर्धन,लाचार को नहीं कहीं माफ है।
आई है संकट तो झेलना तुम्हीं को पड़ेगा,
कम पैसे में हीं बारह घंटे काम करना तुम्हीं को पड़ेगा।
न हमदर्द है ,न कोई निर्धन की मशीहा है,
कहने वाले लाखों मिलेंगे,फटे हृदय को सीता कौन है।
है सब बनता राजा, परजा को देखता कौन है,
एलेक्शन के वक्त प्रजा भी कहाँ पूछता है तू कौन है।
निर्धन की जान की कीमत नहीं कोई समझता है,
इसलिए निर्धन फूटपाथ पे जीते और मरते हैं।
तलवार सुरक्षित रहता है म्यानों से;
देश विकशीत बनता है मेहनतकश मजदूरों से,
यही बात तो नेता और अमीर नहीं समझते हैं।
क्या कभी सोचा कैसे निर्धन जीता औ' मरता है,
जरा करो शर्म ये धनवानों की सरकार! तेरी साँस इसी पे चलती है।
©skmahto