कुछ कदम साथ चली वो रात,
अकेलापन संग मेरे बैठा चुपचाप।
चाँदनी छूती रही खिड़की के शीशे,
कुछ ने कहा, कुछ मैंने सुना।
अनसुना संगीत दिल के कोने में बजता,
जैसे किसी ने कहीं दूर से बुलाया।
ये अकेलापन, न दोस्त, न दुश्मन,
एक अजीब साथी, जिससे बातें हज़ार।
फिर भी, यह कोरा कैनवास,
कहानियों से भरा, पर किसी से कहा नहीं।
अकेलापन, मेरा मौन शिल्पी,
जीवन की रंगीनी में छुपा अपना रंग।