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पैरों में छाले

पैरों में छाले पड़ गए दूरियां बहुत हो गई
एक शहर छोड़ा दूसरे शहर पहुंच जाएंगे
पैरों में छाले पड़ गए पीड़ा बहुत हो रही
जहां मिली थी वही बैठ लिए पेड़ की छांव
मंजर दिन पर दिन बढ़ता गया और वक्त है
नौनिहालों को लिए कांधे पर चल तो मैं दिया
इस आस में पहुंच जाऊंगा विश्वास में घर
कैसा सफर कभी ना दे मेरे दाता मेरे ईश्वर
प्रकृति के इस नियम को मैं हमेशा स्वीकारते
कभी न खिलवाड़ करूंगा तेरे आंचल से
तू रहम दिल है यह जगत जननी प्रकृति
कुछ है हम था मेरे दिल में वह तोड़ दिया तुमने
मेरी खामोशियों का जवाब मिल गया मुझे
बस इतना सा है जवाब मेरा तुमसे मुझे माफ कर
मैं सदा तेरा कर्जदार हूं और पुत्र हूं तेरा प्रकृति
मैं सोचता रहा शहर में ऐसो आराम होगा जीवन
मगर खामोशियों ने तोड़ दिया मेरा ख्वाबों का मंजर
अभी वक्त ठहरा है मैं भी ठहर जाऊंगा विश्वास
मेरे कदमों की चोटिल छालों में पीड़ा बहुत है
विश्वास भी है कि मैं घर पहुंच जाऊंगा अपनों के बीच
©lawnishtha