बैठी है शीतल मिट्टी पे
जैसे पवन की सुंदरता मे
गले लग जाऊ तेरे,
जब जब तुझे पुकारु
तू बैठी है, पेड़ की छाँव मे ।
मैंने चाहा कि तुम मेरे
पास आओ, पर तुम
थी किसी ओर की सोच मे
न जाने किस
ख्याल मे बैठी थी,
पेड़ की छाव मे ।
कोशिश तो की मैंने बहुत,
तुमसे मिलने की,
लेकिन तुम हो कि
अपने ख्याल मे डूबी हुई हो।
न जाने किस सोच पर
न जाने किस चिंता पर
पर ढूंढता रहा पूरा दिन
लेकिन तुम बैठी थी,
पेड़ की छाव मे ।
चाहूँ तो पंख लगा के आ जाऊ,
चाहूँ तो पवन के झोंके मे बह जाऊ,
लेकिन कोशिश करने पर भी
तुम तक न पहुंच पाऊ ।
मैंने देखे थे अरमान बहुत
कास तेरे फलो को खा पाऊ
लेकिन लोगो ने ऐसे
छोड़ा तुझे कि जिसके कारण,
मैं तुझे न ढूंढ पाऊ
फिर भी तुम बैठी हो
पेड़ की छाव मे ।
- शिव शंकर महतो
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