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"फ़ुरसत"

एक इश्क़ का नगीना तुम्हारा मेरा पास रखा है, कभी लगे जो फुरसत तो ले जाना।
यूं तो कुछ हमारे लम्हे भी रखे है मैंने सहेज कर, मन करे तो मुड कर देखने इन्हे, एक दिन जीने फुरसत में आ जाना।
तुम्हारी कुछ प्यार भरी बातों को भी लिख कर रखा है मैंने, लगे जो फुरसत, तो चाय की चुस्कियों के बहाने सुनने आ जाना।
कुछ वायदे खोखले तुम्हारे, मेरी नींव प्यार की आज भी भरे बैठे है, लगे जो फुरसत तुम्हे तो ज़रा बुनियाद बनने आ जाना।
कुछ दिए हुए तोहफ़े तुम्हारे आज भी मेरी अलमारी में संभाल कर रखे है मैंने कभी लगे जो फुरसत तुम्हे आकर देख जाना,
कुछ दिए हुए तुम्हारे आशिक़ी की वायदे मेरे दिल के घरोंधे में बिखरे से पड़े है लगे को फुरसत तुम्हे तो अपनी बेफावाई के मोल तोलने आजना।
फैला पड़ा है मेरा आंगन तेरी याद की बीगती बरसात में, लगे को फुरसत तो मौका निकाल कर जूजते इस बारिश में मेरी रूह के फूलों को चहकने आ जाना।
कुछ खत तुम्हारे लिखे मेरे पते, अब गुमनाम से है,
वापस तुम्हारे पते पर ले जाता नहीं डाकिया, लगे जो फुरसत तुम्हे तो निकलते मेरे गलियों से ज़रा इन्हे ले जाना।
तो ज़रा तोलने मेरी तनहाई अपने तराजू में अपने रकीब की वफाई ले अना, गुजरो जो फुरसत में मेरी गलियों से अपने इन नगीनों को ले जाना।
हुए पराय हम तुमसे अब इनका मुझे मोल नहीं, मिला दो इन्हे अपने रकीब से की, इन्हे अपना नया मुकाम मिल जाए, लगे जो फुरसत तुम्हे तो इन्हे ले जाना, लगे जो फुरसत तुम्हे तो मुझे अलविदा कह जाना।
©rishab