पिता प्रेम की परिभाषा और प्रेम की मूरत है
मुझे कोई देव नहीं भाता प्यारी तेरी सूरत है।
अपने सपने भूलकर वो मेरे सपने बुनता है
वो पिता है वो पसीने मे दिन -रात पिघलता है।
खोकर अपनी नींदों को मुझे सोते देख मुस्काता है
और खुद भूखा रहकर मुझे जबरन खिलाता है।
वो पिता है , केवल वही ये कर सकता है
भूल जाता है वजूद अपना,अपनों से कटकर वो जीता है।
वो दिन रात कोशिशे करता है, मेरे सर पर छत रहे
मुझे अच्छा भविष्य मिले,रसोई मे राशन रहे।
वो रोटी नहीं बनाता पर घर मे रोटी लाता है
और उसी रोटी को सुखा- सुखा कर खाता है।
मेरी खातिर वो दर्द मे भी मुस्काता है
मुझे तकलीफ ना हो, माथे पर शिकन नहीं लाता है।
माँ का प्यार सबको दिखता उसका नज़र नहीं आता है
पर मेरे लिए तो मेरे पिता भी मेरी माता है।
उसके प्रेम की छाया मे कितनी शीतलता है
उसके आश्रय मे कितनी निश्चिन्तता है।
बचपन कितना प्यारा था बापू तेरी गोद मे
सीख मेरे लिए छिपी थी बापु तेरे क्रोध मे।
मुझे डांट कर तु मेरे सिरहाने बैठकर रोता है
पिता ही तो है , इसका दिल नारियल सा होता है।
क्यूँ तु हमेशा उपेक्षित सा उसे रखता है
तु माँ को गले लगाता है पर पैर उसके छूता है।
अब उसको भी गले लगाना है , उसे भी प्यार जाताना है
यही पिता को उसके त्याग का छोटा सा नज़राना है।
©04shivanya
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