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पिता की साया

अब्द सा हू पिता की
इज्जत, मान - मर्यादा का अल्फ़ाज़ सा हू पिता की।
मेरे इश्तियाक का अशफ़ाक है वो
अश्क पसंद नहीं उन्हें मेरे आंखो में
मै तो यही कहूंगा
जिसके पिता है वो खुशनसीब है लाखों में।
बेटे के मुस्कान के खातिर
हर बात को गामगुसार देता है
कदम कदम पर संभलने की विचार देता है।
कोई बात नहीं कि,
पिता बात करता है या नहीं करता है
लेकिन,वो बेटे के आगे कभी कष्टदाई हालात नहीं करता है।
शौक नहीं उसे मेहनत की
फिकर है परिवार के आबाद की
भला समझे तो कौन समझे
उसके मन के अवसाद की।
पिता का अर्श असीम है
हर बात से आलिम है।
उस पैर को डिगने मत देना
जिसमे पिता ने ताकत दी हो चलने की,
मायूस ना होना गम के हल्के झोकों से
याद करना पिता के शिक्षा को
हर स्थिति में खुद को ढालने की।
जन्नत है पिता के साए में
सुकून मिलता उसके मुस्कान भरी हवाएं में।
पिता के जख्म का मरहम बनना
मत सोचना कि ऐब सा हू,
भूलकर भी यह ऐलान ना करना
कि,मै औरंगजेब सा हू।
©Nilesh K