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प्रेम

कैसे मैं प्रेम पर लिख दूँ कोई ग्रन्थ?
जबकि ये है निःशब्द, अनाम और अनंत!!
कैसे परिभाषित कर दूँ, उसे शब्दों में गढ़ दूँ???
अंतर्मन की बात को तुम्हारा मन ही पढ़ सकता है...!!
सुना है कोई ज़ुबां नहीं होती प्रेम की..
ना होती कोई लिपि और भाषा..!!
बस इसे स्वच्छंद प्रेमी जोड़े जीते हैँ, महसूस करते हैँ
ज़ब कुछ ना था...
ना कागज़ ना कलम ना दवात स्याही की!!
तब भी थी प्रेम की ये अनुभूति ..!!
पाषाणकालीन आदिम प्रेम भी था निश्छल, निर्मल और मासूम..
तब भी की गयी कुछ संकेतों और रंगों से
प्रेम को उकेरने की कोशिश..!!
आज भी हैँ उनके हस्ताक्षर कंदराओं में!!
जिन्हे हम पढ़ने की भी कोशिश करते हैँ और लिखने की भी..
पूनम भास्कर 'पाखी'
©pakhiiii