प्रेम का कोई रंग नहीं, फिर भी वो इंद्रधनुषी है।
विरह का कोई स्वर नहीं, फिर भी वो गीत सुनाता है।
प्रेम में हम खो जाते हैं, जैसे नदी समुद्र में।
विरह में हम टूट जाते हैं, जैसे तारों का झुरमुट।
प्रेम कहता है आओ, और विरह बोलता है रुको।
एक सुख का सागर है, तो दूसरा दुःख की धरोहर।
फिर भी, प्रेम और विरह सिक्के के दो पहलू हैं,
एक के बिना दूसरे की कोई कहानी नहीं।