प्रेम और विरह

प्रेम में विरह का साथ,
अधूरी चांदनी रात।

कहां गये वो पल सुहाने,
जब तुम और मैं थे साथ।
अब हर दिन बस ये उलझन,
कैसे बीतेगी ये बरसात।

तुम्हारी यादों का कारवां,
मेरी रातों में जगाता है।
तुम्हारी हंसी की गूंज,
अब भी मेरे दिल को छू जाता है।

विरह की इस घड़ी में भी,
प्रेम का दीपक जलता रहा।
तुमसे दूर होकर भी,
तुमसे ही मेरा दिल बहलता रहा।

प्रेम में विरह का साथ,
ये सिलसिला तो पुराना है।
जुदाई के इस सफर में भी,
तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में ठाना है।