प्रेम की गलियों में भटका,
विरह के सन्नाटे में अटका।
दोनों ही पल हैं जीवन के,
एक अमृत, तो दूसरा विष प्याले में।
प्रेम है जैसे बहार का संगीत,
विरह वो रात, जिसमें नींद नहीं परात।
पर इस आंगन में दोनों खिलते हैं,
एक दूसरे के बिना, बेमानी में जीते हैं।
प्रेम से है जन्म, विरह से है विकास,
एक बिना दूसरे के, जीवन अधूरा सा।
तो आओ, इन दोनों को गले लगाएं,
जीवन के इस सफर को, साथ में मुस्कुराएं।