प्रेम का विरह

जब सन्नाटे ने बातें की, चुप्पियों में प्रेम बोला,
दूरियों में ही समझ आया, विरह का गहरा मोल।

आँखें खोजती रहीं तुझे, इन भीड़-भाड़ वाली गलियों में,
तू नहीं था पास, पर तेरी यादें थीं मेरी सहेलियों में।

प्रेम ये नहीं कि साथ हो, हाथों में हाथ डाले रोज़,
ये तो वो अहसास है जो विरह में भी ना खोजे कोई खोज।

हर बिछड़ने में एक मिलन है छिपा, इतना याद रखना,
प्रेम में विरह अगर नहीं, तो प्रेम को कैसे पहचानेगा जहान?