प्रेम, नदी की तरह बहता,
विरह, पतझड़ की तरह छंटता।
जहां प्रेम दीपक सा जलता,
विरह, रात्रि की चादर ओढ़ता।
प्रेम एक दूसरे में समाहित,
विरह दूरियों का प्रतीक बनता।
एक में मिलन की मधुर बेला,
दूजे में विदाई का मर्म समेटता।
प्रेम संगीत का सुर बुनता,
विरह, चुप्पी का कोरस गाता।
पर विरह भी प्रेम का ही साथी,
क्योंकि एक के बिना दूजा अधूरा रहता।