वो प्रेम की पहली बारिश,
जब नयनों से बहे थे हर्ष।
मिलन की वो मधुर घड़ी,
जब हर पल था केवल तू ही तू।
फिर आया विरह का मौसम,
चुप हो गए हँसते चेहरे।
दूरियों में बढ़ता गया प्रेम,
हर साँस में तेरा ही नाम था।
प्रेम जैसे जीवन का आधार,
विरह जैसे अंतहीन रात।
एक उजाले की आस में,
तेरी पाठशाला में सीखा मैंने प्रेम।
प्रेम और विरह, दोनों एक साथ,
जैसे सूरज और चाँद की बात।
एक न हो, तो दूसरे की क्या कहानी,
यही है प्रेम की सच्ची निशानी।