दोपहर में आथी थी,
छुपछुपकर रोज मिलकर जाती थी;
हँती थी ,मुस्कुराती थी,
नयनों से तीर चलाती थी!
कभी पास तो कभी दूर चली जाती थी,
अपने दोनों बाँहों को फैलाकर आलिंगन करती थी,
मैं आवाक हो जाता था,
ईश्क के नशे में चुप चाप हो जाता था!
मन्द-मन्द हवाओं में,
मेरे नर्म लवों पे मिठी सी चुंबन लेती थी;
मेरे वदन पे उस वक्त मानों,
ईश्क की जाम की नशा तन-मन में छाजाती थी!
फिर कुछ घंटों बाद चली जाती थी,
हर वह तस्वीर मधुर मिलन की यादों में समेटकर चली आती थी!
वह इतना चाहती थी कि,
हर वक्त मुझे हीं याद करती रहती थी;
जब भी मौका मिलती थी कि,
वह बहाना बनाकर मुझसे मिलने चली आती थी!
फिर वही बात रे वही बात,
ईश्क में में क्यामत की मुलिकात की रात!
प्यार छुपता नहीं लाख छुपाने से,
एक दिन राज पता चल हीं जाता है छपछुपकर मिलने से
आखिर क्या हुआ चोरी-चोरी बारबार छुपकर मिलने से,
फिर वही हुआ जो होता है अक्शर प्यार में पकराने से!
लगा शख्त प्रतिबंध मझसे मिलने से,
सुधर जा वरना!तुझे कोई रोक न पायेगा मरने से!
हर पल ,हर घड़ी,यादों में खोई-खोई सी रहने रगी,
किसी कोने में शिशक-शिशक कर रोने लगी!!
उदास,निराश,आँखों में डबडबाया हुआ आँसू लेकर,
सोच रहा था प्यार करता कहीं दूर जाकर!
अचानक आत्मविश्वास जगा हमारे हृदय में,
मौका मिलते हीं हम दोनों फुर्र हो जायेंगे प्रेम-गगन में!!
थी शादी एक दिन अनारकलि की गाँवों में,
उस रात थी मेरी प्रेमाका मेरी बाहों में;
आखिर आहीं गई भागकर,
प्रेम पाने की चाहत में अपनी घर-वार छोड़कर!
मैं भागता नहीं उसे लेकर,
बस,प्यार से राजी हो जाती शादी हेतु खुलकर;
धुमधाम से बैंड-बराती लेजाकर शादी करते,
माँथे पर सेहरा बाँध,माँग में सिंदुर भर ,
लियाते दुल्हिन बनाकर अपने सपनों के घर पे!!
ढूंढना चालू हुआ हर जगह ,
पर मिल नहीं सके हम दोनों किसी जगह;
उधर प्रेमिका के घर मातम छा गये,
इधर तड़पता हम दोनों को प्यार के चाँद-तारे दिल मिलगये!
आखिर अन्त में ससुराल आना हुआ वर्षों बाद,
सासु माँ को जब याद आई नाती-नतनी वराषों बाद!
सिकवा-शिकायत को एक दिन भूलाकर,
पाया हम दोनों ससुराल में भरपूर प्यार दिल खोलकर!!
न कोई रोक, न कोई टोक,
अब चल रही है बेसुमार मधुर प्रीत,
सब खुश है,सब आते जाते हैं,
मानो कोई गा रहीं हैं लवों पे चुमकर प्रेमगीत!!
(यह कविता किसी दुसरे पर लिखी गई है,
दोस्तों! कोई इसे अन्येथा न लें ।)
-------- संदीप कुमार "संजन"
भगवानपुर,अररिया,बिहिर
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