आओ प्रिय गले लगते है
संग तुम्हारे हम चलते हैं
धरती अंबर एक हो रही
शाम घनेरी सुबह हो रही
पथ पर जाने कितनी माया
लहूलुहान हो रही काया
आओ प्रिय गले लगते है
संग तुम्हारे हम चलते हैं
पथिक न थकता मंजिल थकती
रेन बसेरे शाम को सजती
कंकड़ पत्थर जाल बिखेरे
मौसम भी आंख मिचोली खेले
निर्मल काया अविरल माया
देख तेरे संग्राम के क्षण में
मौत से लड़ता पथिक बढ़ रहा
सांस की डोरी बांधे तन में
कंटक पथ पर चलती काया
रुकता नहीं पथिक क्षण भर भी
अनल की दारूनता सहकर भी
दम की जटा शिखर पर बांधे
तिमिर की आंधी को ललकारे
सपने टूटे दिलबर रूठे
रूठ गए वह सारे कुनबे
आओ प्रिय गले लगते हैं
संग तुम्हारे हम चलते हैं
…... नागेंद्र सिंह, पटना, बिहार
©nagendra
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