ये धुर परिवर्तन की रातें हैं, नया सवेरा आयेगा
नूतन सा उजियारा होगा, जो जगमग छठा बिखरायेगा सौन्दर्य की सी उपमा होगी,तन-मन मधुर संगीत सी वीणा का वो तार मनोरम,रस मधुर बिखरायेगा।
प्रकृति की यह नयी अंगडायी,ओस की बूँदो सी
ठंडी-ठंडी सिसकियों सी,अन्तर्मन के प्रतिघात सी
मन को विह्वल बनाएगी।
कवियों के वो प्रेम गीत, हास्य रस से विभूत गीत
वीर रस से प्रेरित गीत,सब में एक संगीत हो
जो प्रतिपद परिवर्तन से विभूतित हो
प्रतिपल छन्दों से आलोकित हो
जो नूतन उत्साह का संचार करे,मन में नवीन मधुरिमा सी भरे।
तब उस नूतन सूर्योदय में, संसार के नये अन्तर्योदय में
अन्तर्मन के जाग्रतोत्सव में,वह नयी छठा बिखरायेगा।।
©-kuldeep
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