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प्रकृति

आज बाहर जाकर देखा तो नजारा कुछ अलग सा था,
पिंजरे में सांस लेने वाले परिंदे आजाद थे और प्रकृति पर अपना हक जताने वाला मानव घर की चारदीवारी में बेचैन सा था।
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