प्रकृति के प्रेम से विह्वल जो हुआ मनुष्य
पृथ्वी के प्रलय को अचल है हुआ मनुष्य
पतन - पुष्टि के दिशा में हो चुका अविरल
पथ पर लौटना अब है कठिन, है प्रबल
पुनः जो पृथ्वी को परास्त करने का प्रयास किया
पुनः जो पृथ्वी के वनों का उपहास किया
प्रारम्भ यही है प्रलय के प्रकोप का
जो समय हुआ प्रकृति- प्रेम के लोप का
विकास से विनाश तक हुआ है अग्रसर
संकट-काल पुकारने का है ये अवसर
प्रलय- प्रकोप के मार्ग में
अखंड साधना की आवश्यकता है
मनुष्य-मोह की अनिष्ठा है
पुनः प्रकृति प्रवर्तन की आवश्यकता है
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©chirag27
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