वह सुबह की पहली किरण,
जब चुपके से चुम लेती है धरा का कण-कण।
अम्बर के रंग बदलते हैं,
परिंदों के गीत मन भाते हैं।
नदी की कल-कल, पहाड़ों का मौन,
हरा-भरा हर एक कोना, प्रकृति का वरदान।
शाम ढले, जब सूरज कहे अलविदा,
चाँदनी बिखेर दे, जैसे सोने का बिस्तर।
यह प्रकृति की सुंदरता, अद्भुत, अनमोल,
जीवन से है यह प्यारी, यही है सच्चा सोलह श्रृंगार।