पतझड़ के पत्ते
पतझड़ के पत्ते धीरे-धीरे झरते हैं,
बीते मौसम के किस्से चुपके कहते हैं।
सूखी डाली पर सपने फिर सजते हैं,
नए बहार के रस्ते यहीं से निकलते हैं।
गिरकर भी पत्ते हिम्मत सिखलाते हैं,
मुश्किल में जीना हमको बतलाते हैं।
पतझड़ कहता — मत तुम घबराना,
हर सूनेपन के बाद बसंत है आना।
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