पुराना शहर
पुराना शहर कुछ कहता है,
धीरे-धीरे सा बहता है।
टूटी गलियों, पुराने घरों में,
बीते कल को रखता है।
वहीं पुरानी चाय की खुशबू,
वहीं पेड़ों की ठंडी छाँव,
हर मोड़ पर यादें बैठी,
जैसे कोई अपना गाँव।
दीवारों पर फीके रंग हैं,
फिर भी उनमें जान बहुत,
हर खिड़की में छुपी कहानी,
हर आँगन में पहचान बहुत।
शाम ढले जब दीप जलें तो,
सड़कें सोने जैसी लगतीं,
पुराना शहर मुस्कुराकर,
दिल की बातें धीरे कहती।
नया ज़माना आगे बढ़ता,
फिर भी कुछ पीछे रह जाता,
पुराना शहर वही जगह है,
जहाँ इंसान खुद को पाता
N