पूर्ण होना कोई मंज़िल नहीं,
यह तो भीतर जलते दीप का धीरे-धीरे उजाला फैलाना है।
हम अक्सर सोचते हैं—
जब सब कुछ मिल जाएगा, तब हम पूरे होंगे।
पर सच यह है कि पूर्णता
कभी बाहर से नहीं आती,
वह तो भीतर की दरारों में
रोशनी भरने का नाम है।
एक अधूरा घड़ा भी
अगर प्यास बुझा दे
तो क्या वह अधूरा कहलाएगा?
एक टूटा हुआ पत्ता भी
जब धरती पर गिरकर
मिट्टी बन जाए,
तो क्या उसका सफ़र व्यर्थ होता है?
पूर्ण होना
ख़ुशी के शिखर पर खड़े होने का नाम नहीं,
बल्कि दुख की घाटी से
मुस्कुराकर निकल आने की कला है।
यह अपने डर को पहचानकर
उसके साथ चलना सीख लेना है,
अपने दोषों को दंड नहीं,
अनुभव मान लेना है।
जब हम अपनी हार से नफ़रत नहीं करते,
जब हम अपनी खामोशी से भागते नहीं,
जब हम आईने में खुद को देखकर
आँखें नहीं चुराते—
उसी क्षण
हम थोड़े और पूर्ण हो जाते हैं।
पूर्ण होना
किसी और जैसा बनने में नहीं,
अपने जैसा होने की
निडर स्वीकृति में है।
यह जान लेना कि
हम जैसे हैं,
उसी रूप में
जीवन हमें स्वीकार कर सकता है।
और तब—
जब मन शांत हो जाता है,
जब अपेक्षाएँ थककर सो जाती हैं,
जब आत्मा कहती है
“अब और कुछ साबित नहीं करना”—
उसी मौन में
पूर्णता जन्म लेती है।
पूर्ण होना
खुद को पा लेने का नहीं,
खुद से मित्रता कर लेने का नाम है।
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