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रात- दिन

ये राते रात ही नहीं होती है
हर बादल से बरसात नहीं होती है।
ये राते सनातन थोड़े है
नया सबेरा भी आयेगा
हर लम्हा तारो की दृष्टपात नहीं होती है।
रात में लोग बेबात होते हैं
उस वक्त तारे गुनगुनाते है
ये राते रात ही नहीं होती
अपने सरपंच चांद के आगे
अपने जज्बात सुनाते हैं।
जीवन एक वाहन है
रात - दिन उसका पहिया है।
रात इसलिए नहीं कि
अंधेरा ही अंधेरा हो
और दिन इसलिए नहीं कि
सबेरा ही सबेरा हो।
रात दिन का होना जीवन में
सुख दुःख का सीख देता है
हर स्थिति में जीने की ताक़त का भीख देता है।
हर वक्त , वक्त वहीं होता है
बस रात दिन का रूप बदलता है
दिन में सूरज और रात में चांद निकलता है।
किसी को देख के जलना गुनाह नहीं होता
क्योंकि दिन का राजा सूरज भी किसी से जलता है
चांद तारे के रूप को कुचलता है
लेकिन हा,अंधकार को मिटाने का
उज्जाला दे जाता है
रात को अंधकार से मत देखो
क्योंकि,ये राते रात ही नहीं होती है।
©Nilesh K