सवाल अजीब है, पर तुम शायद समझ पाओगी मुझे,
धूल खाती हमारी इस रिश्ते की किताब से, कुछ सुना पाओगी मुझे?
किताबें जिनमें मिली जुली दोनों की लिखाई थी,
तुम्हारे होठों की नमी से बनाई हुई स्याही काम आई थी...
जब हम आपस में कहीं गुम थे, उंगलियां बेहद उलझी हुई थी,
कलम उनकी आगोश में बेझिजक अपना काम कर रही थी...
कलम को वश में किसने किया था? ये याद दिला पाओगी मूझे?
कौन सा शब्द किसने लिखा, ये बता पाओगी मुझे?
कभी कभी कुछ पंक्तियाँ हम बांट लिया करते थे,
अंधेरे में, या सांसे सर्द हो जाने पर, कुछ पन्ने ओढ़ लिया करते थे...
अब कोरे कागज़ के अंदर मुझे नींद नहीं आती,
जिनमे तुम्हारी पंक्तियां ज्यादा हो, वो पन्ने दे पाओगी मुझे?
याद है? आखरी कुछ कहानियों में लिखाई धुंधली पड़ गई थी,
शायद आँखों से कुछ बूंदें गिरी और स्याही फैल गई थी...
नहीं नहीं रोया नहीं था कोई,
पलकें नम हो गई थी जब मुस्कुरा रहा था कोई...
अब तो शायद सारे ही लफ्ज़ धुंधले हो गए हैं,
अब आंसू गिरते नहीं, तो बंजर हो गए हैं...
बस अब खयाल रखना है ये लफ्ज़ सूख ना जाएं कहीं,
इन्हें कब आँसुयो से नम करना है, याद दिला पाओगी मुझे?
शायद तुम्हे पता चल गया हो,
पर कहीं कहीं तुम्हे बिना बताए कुछ नज़्में छुपा दी थी मैंने,
लिखी तो वो मैंने थी,
पर तुक तुमसे चुराई थी मैंने...
बिखरे हुए उसमे जो शब्द हैं ना!
तुम्हे वापस देखने की आस में वो रुकते हैं,
कहीं बिना देखे पलट न दो,
इस डर से कागज़ भी कांप उठते हैं।
खैर! खेल खेल में लिखी कहानियां, किताब लगभग भर गई,
खाली बचे पन्नों का क्या करना है, ये बात पाओगी मुझे?
©a_friend
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