ये रक़्स-ए-हवा
सिर्फ़ एक झोंका नहीं होता,
ये दिल के हर कोने में
छुपा हुआ रोना होता।
कभी लम्स बनकर
ख़ामोशी को सहला जाती है,
कभी बेक़रार आहों में
रूह तक उतर जाती है।
इसकी हर जुम्बिश में
एक अनकही सी दास्ताँ है,
हर सरसराहट में
बीते लम्हों का कारवाँ है।
ये जब गुज़रती है
तो यादें भी साथ ले आती है,
हर टूटा हुआ ख़्वाब
आँखों में फिर जगा जाती है।
मैंने भी इस हवा में
अपना दर्द घोला है,
हर चीख़ को ख़ामोशी में
धीरे-धीरे बोला है।
ये हवा जब रोती है
तो कोई सुन नहीं पाता,
हर आँसू बेआवाज़ गिरता है
कोई समझ नहीं पाता।
अब मैं भी हवा की तरह
ख़ामोश बह रही हूँ,
अपने ही जज़्बातों में
धीरे-धीरे ढह रही हूँ।