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"रंग तुम्हारे इश्क़ का"

मेरा इश्क़ ये हसरत कर रहा है, तेरे गाल पर गुलाल मलूं।
और डर ये सता रहा है कि, तुझे छूना पड़ेगा।
हवा में अबीर मेरा इश्क़ का हो, और रंग तुझे मेरी रूह का रचना पड़ेगा।
तेरे इश्क़ को पीस कर पीकर मै परे दुनिया के उन्स से दूर हो जाऊ,
मुन्तजिर है तुझे रंगु मैं मोहन जैसे बनाकर राधा अपनी तुझे अपने जिस्म से एक कर दू, कहीं बीत न जाए ये लम्हे इस कुरबत की चाह में, बस जस्तजू है तुझे अपने इश्क़ के रंग में रंगने की।
बने जो नंदलाल, तुम राधा बन जाना, जो हो रंग मेरा सुर्ख लाल तुम इससे जिस्म अपने सजा लेना, रंग कर मेरे बदन को तुम यूं बस हस कर मत चले जाना।
बादे- ए- सबह बन कर बेहिस रंगने अपने रांझे को आओगी ना , बीबाक बंदगी से, बेखुदी से दूर, मुझे अपने आगोश में समा लोगी ना फिर हम होंगे अलहदा ये भूल जाओगी ना।
रंगने मेरे गालों को अपने मलमल के हाथो से आओगी ना, बेहिसाब होकर को इस जश्ने - रंग में मुझे रंगने आओगी ना ।
मुझ पर रंग चड़ चुका है तुम्हारा इस सवर्ने आओगी ना, है जिस्मो जान तुम्हारी इन उचाईओ को मंजिले गहराइयों तक लाओगी ना।
बनकर राधा मेरी मुरलीधर को रंगो से सजाने आओगी ना।
भूल ना जाना ये जिस्म दो है मगर, रूह तेरी मेरी एक ही है, तेरे रंग में रंगने की हसरत कररहा है ये दिल तुम भर कर हाथो में अपने मेरे इश्क़ का गुलाल लाओगी ना , फैला कर समा में अबीर मोहबब्त तेरी मेरी का तुम महफ़िल में आओगी ना।
हसरत तुझे रंगने की कर रहा मेरा इश्क़ तुम संवारने मेरे इश्क़ में आओगी ना,
तुम रंगने मुझे आओगी ना।
©rishab