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रोजमर्रा की बाते

कट रहे थे दिन रोजमर्रा की बातों में
पर रातों को ख्याल दिल जला दे
हर जागते पलो की खबर सम्हाले
सोते हुए लम्हों में बांट देते है
सांझा करना चाहे दिन का हाल मगर
कानों में जाए तानो की बौछारें
समझे कितना और कब तक सुने
सोचे कितना और कब तक सहे
हाथ बटाए कुछ मदद भी करे पर
कब तक खुद के आंसू छिपाए
दिलासा दे और उम्मीद रखे
कदम बढ़ाए कि बदलाव तो हो
थोड़ा भरोसा ही तो मांग रहे
कुछ समय और थोड़ी ताकत चाहे
रास्ता भी ढूंढ लिया खुद से
चल भी रहे अकेले है
हर मोड़ पे पैर खींचते
हर कदम में ताने कसते
कान बंद कर चली भी जाऊं
आंख मूंद कर चलू मैं कैसे
समझती हूं दर्द सभी का
पर मेरे छिपे घावों का क्या
हर दिन वही बाते होती है
हर रात भी ख्यालों में दोहराते
सालों बीते इस रोजमर्रा की बातों में
पर रातों को ये ख्याल दिल जला दे
©namrata05