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रोशनी

एक दिंया, सबको दिया,
कोई लहु से भी रोशन हुआ,
कोई तेल में हि, डूब गया।
रोशनी कि हिमाकत तो देखो,अंधेरे पर भारी थी,
पुरी कायनात पर, कालीख पुत गई,
जंग अभी तक, जारी थी।
एक दिया बुझकर भी, रोशन कर गया,
कानों में मेरे,आकर बोला, इश्क कि, ज़िम्मेदारी थी।
बारिश कि आहट में, मोर नाचने लगे,
अनजान से,वफ़ादारी थी।
बिक चुका था, सावन भी, लुट गया, बर्बाद हुआ,
कुछ ऐसी, हिस्सेदारी थी।
मातम मनाते भी, तो कैसे,
बिक गए वहां, जहां अपनी ही, दुकान दारी थी।
फिर से इन भटकों को, राह तो दिखा दु,
ये जो सारे,मुरझाए हुए दिये है न,
इनमें ज़रा सी, ईश्क कि, आग तो लगा दूं।
कवि:-अभय ना.ताकसांडे
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