रोशनी का शोर

शहर की इस चमक में, रोशनी का जोर,
बिल्डिंगों के जंगल में, चाँद ढूँढता है मजबूर।

आसमान भी पीछे छूट गया, इन रोशनियों के संग,
रातें हैं ज्यूँ दिन, और तारे भूले अपना रंग।

खिड़की से झांकता हूँ, तो दिखता है एक नया आसमान,
इन्ही रोशनियों में खोये, हम सब हैं अनजान।

फिर भी, इस रोशनी में, एक अजीब सा सुकून,
शहर की भागदौड़ में, लगता है ज्यूँ कोई जूनून।

ये रोशनी, ये शोर, शहर की इसी तो साजिश है,
जो हमें जगाए रखती, हर पल, हर दिशा में।