रोशनी की तलाश लोग कहां करते है
जहां लोग मुर्दों को जलाया करते हैं
समा तो जलती है परवाने के जलने से
शहादत शहीद-ए-आजम भगतसिंह से
ज्वाला दिल में यूं ही नहीं भड़कती है
सदियों का ज्वाला दिल में भड़की है
रोशन दिया हो या दिया चिराग को
पतंगों को तो शिकायत चिरागों है
आज भी चिरागों की रोशनी रोशन
कुछ दीपक जले हैं कुछ तलाश है
रोशन घर और मंदिर तेरे दर से हैं
बिना दीपक तेरे अब मंदिर बंद से हैं
लगता है ऐसे ही कोई बंदिश लगी है
वरना दीपक को जलाने दीया नहीं है
दीपक की रोशनी से रोशन दिया है
दीयों से रोशनी दिवाली की शाम है
अग्नि का पहला अविष्कार तुम से
दीपक रोशन घर और परिवार से
नुमाइश नहीं महफिल की तुमसे
फिर भी दिलों की रोशनी हो तुम
सिर्फ तुम्हारे लिए दिल से यूं लिखा
कभी चिरागों को तुमने जलने दीया
तलाश चिरागों की महफ़िल में है
और महफिल की तलाश दीपक में है
©lawnishtha
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