ऋतुओं का डाकिया

बसंत आया, फूल खिलाया,
हरियाली ने दस्तक दिया।
कोयल की कूक, तितली का मूक,
प्रकृति ने जीवन गाया।

गर्मी की धूप, तपती रूप,
नदियाँ भी लगीं थकानी।
आमों की मिठास, बर्फ की आस,
धरा ने ओढ़ी सोने की चादर।

सावन की बूँदें, बदली का गुणगान,
धरती ने प्यास बुझाई।
हरित चादर तले,

पेड़ पौधे झूमें,
जीवन ने खुशियाँ मनाई।

पतझड़ लाया, पत्ते गिराए,
कहानियाँ बुनी अलविदाई की।
जीवन की रह, अविराम गति से,
ऋतुएं ने बातें सुनाई।

शीतल हवा, कोहरे का सिलसिला,
सर्दी ने कदम रखा।
अलाव की आग, पकवानों की बौछार,
ठिठुरते मन को जगह दिया।

ऋतुएं आती-जाती रहेंगी,
जीवन के इस पहिए को घुमाती।
हर रंग,