ऋतुओं का मेला

बसंत की आहट पे खिले हैं फूल,
नई कोपलें, नई उमंग, नई कूल।
गर्मी की दोपहरी रसीली,
आमों की मिठास, नीली झीली।

सावन की झड़ी लायी हरियाली,
बहारों में छिपे किस्से, कहानी की नवीनताली।
पतझड़ से मिले हैं सिख,
जीवन में बदलाव ही इक ऋतुविक।

सर्दी की ओढ़नी में लिपटे सपने,
कोहरे की चादर में छुपे अपने।
ऋतुएँ बदलती हैं, मन को मोड़ती हैं,
जीवन की पाठशाला में नित नई शिक्षा जोड़ती हैं।