बसंत आती, कलियां खिलतीं
हरियाली में रंग बिखरतीं
गर्मी की दफ़्ती, धरती तपतीं
पीली पत्तियां मौसम बदलतीं
बादल गरजे, बूँदें गिरतीं
पावस की छाया मन को भरतीं
पतझड़ की शाम, सूखे पत्ते
हवा में नाचें, जैसे व्यथा के सिक्के
सर्दी आती, कोहरा छाता
बर्फ़ की चादर धरती संजोता
एक के बाद एक, आती जातीं
ऋतुएं अपना संगीत सुनातीं