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शायद कुदरत ने ये शाजिश की थी

हमने भी यह कोशिश की थी,
किसी को अपना बनाने की।
पर शायद कुदरत ने ये शाजिश की थी
उसे हमसे दूर ले जाने की।
सालो से मंदिर नहीं गए थे हम
पर उसे मांगने को वहां की सीढ़िया भी चढ़ गए थे हम।
याद है मुझको अपनी हथेलियों परछोटा सा दिल बनाना
और उस दिल मे अपना और उसका नाम लिख लेना।
हर किताब के किसी पन्ने पर उसका नाम लिखना, मिटना
वो बार बार ख़त लिखना और बिना उसे दिए ही फेंक देना
उसके नाम की मेहंदी छुप छुप कर लगाना
और उसी से अपने हाथों को छूपाते रहना।
याद है उसका मुझसे अपने प्यार का इजहार करना
और जवाब के इंतजार मे रास्ते के कई चक्कर लगाना।
अंदाज -ऐ -इजहार भी अजीब था उसका
बार बार कहना की तुम्हारी हाँ है ना।
कि हमारा लड़का आपको पसंद है ना
और बिना love u कहे ही love u too कहना।
उसके ऐसे अंदाज पर तो मर मिटे थे हम
खुद से ज्यादा उसके हो चुके थे हम।
उसकी जुबां से अपना नाम सुनकर
खुद के नाम से भी प्यार करने लगे थे हम।
इश्क़ मे जलने लगे थे हम
किसी का उसे देखना भी सह ना सकते थे हम।
धीरे धीरे इश्क़ इबादत सा बन गया
वो मेरा दिन और रात बन गया।
चाँद की रौशनी मे नज़र आता था चेहरा उसका
सारे तारे मिलकर नाम लिखते थे उसका।
बगियां के फूलो मे खुशबू भी उसी की थी
बारिश की बूंदो की छुअन उस जैसी ही थी।
कितने पल उसके बिना पर उसके साथ बिताये थे हमने
उसके ना होने पर भी महसूस उसी को किया था हमने।
किसी पर यकीं ना करने वाले थे हम कभी
उसे पाकर सजदो और दुआओ मे भी यकीं किया था हमने।
पर हद से ज्यादा प्यार घुटन लगने लगा था उसे
धीरे धीरे अपने प्यार को खो दिया हमने।
वो कहता नहीं है मुझे तुझसे दूर जाना है
मेरे बेइंतहा प्यार से डरता होगा शायद
पर उसके तौर तरीके अब वैसे नहीं है
वो मेरे लिए अब उतना पागल नहीं है।
बस मैं ही अब हर रस्म -ऐ -इश्क़ निभाये जा रही हुँ
उसके लौट आने का इंतज़ार किये जा रही हुँ।
पर लगता नहीं अब वो मेरा है
अब मेरी घुटन ने उसको घेरा है।
पर मन करता है पूछूँ उस से
मुझसे ज्यादा क्या कोई चाहेगी तुझे।
अब इश्क़ का उसका भुत उतर गया शायद
अब जरुरत नहीं होंगी उसको मेरी शायद।
अब जब भी तन्हा होती हुँ
खुद से बस सवाल मैं करती हुँ।
क्यों तूने ये कोशिश की थी?
उसे अपना बनाने कि।
जब कुदरत ने ये शाजिश की थी
उसे तुझसे दूर ले जाने की।
✍️शिवन्या
©04shivanya