आज शहर और गांव और कस्बों की सड़कें आज वीरान
सरपट दौड़ती गाड़ियां और आपातकाल मैं कर्मवीर योद्धा
आज हर कोई घर पर है इस महामारी के प्रकोप के बचाव
एंबुलेंस जब दौड़ती है तो लगता है कहीं कोई मामला होगा
दो-तीन दिन में जब रिपोर्ट आती तो लगता सांसे चलती हैं
चलो अच्छा हुआ कि मेरा शहर बच गया लोगों की दुआ से
मगर तुम उन लोगों को कहां भूल गए जो आज सड़क पर
दिन और रात को ना देख कर परिवार को भी छोड़ दिया
इस संकट की घड़ी में दो चार हाथ होने के लिए बचाव में
हर कोई आज योद्धा है तो सिर्फ मानवता को बचाने को
मगर कुछ बेवकूफियां जरूर करते हैं कुछ लोग समाज मैं
तुम्हें सोचना होगा कि मानवता होगी तो तुम्हारा धर्म होगा
जिस के इतिहास को तुम बचाने निकले हो वह बीत चुका
और आज तुमको अपना इतिहास तुम्हें खुद लिखना होगा
मैं जानता हूं कि तुम्हारा इतिहास कुछ कमजोर हो गया है
क्योंकि तुमने धर्म को पढ़ा इंसानियत को नहीं प्राकृतिक
आज तुम फिर से पढ़ना प्रकृति के नियम और सिद्धांतों को
कब और किस समय प्रकृति ने नियमों सिद्धांत में बदलाव
शब्द कहां से कहां निकलते हैं यह पता नहीं चलता मगर
तुम बस इतना समझना कि हम तो वहीं हैं जहां लिखे थे
बस एक दुआ जरूर करना जब कोई एंबुलेंस गुजरे सामने
सब कुशल जाए और वापस आए, मानवता के सिद्धांत से
मैं नहीं लिखता यह सब मेरी कलम की लिखावट बन गई सोचता सिर्फ इतना कि अब कलम से कुछ इतिहास लिखो
जो सैद्धांतिक और प्रयोगात्मक हो प्रकृति के विरोधी नहीं
क्योंकि अगर सैद्धांतिक और प्रयोगात्मक है तो प्रकृति से
कल को बचा पाना बहुत मुश्किल होगा प्रकृति के प्रकोप
मानवता को सदियों से बचाने में बलिदान किया प्रकृति ने
मगर मूर्ख प्राणी समझ नहीं पाता प्रकृति के जीवन सिद्धांत
बेहतर होता कि तुम समझ जाओगे इतिहास अलग होगा
बेहतर से बेहतर तुम जितना करना कि प्यार को कभी ना
बदल कर इतिहास तुम भविष्य लिखना सोच कर आज
हर कोई इतिहास समझ लेता अगर तुम पाखंड आडंबर खिलाफत तुम कुछ भी लिखो मगर इंसानियत के नहीं
बेहतर से बेहतर तुम इतना करो कि आज तुम ठहर जाओ
सोचो अगर तुम फिर जाओगे तो कल मैं तुम सामने होगे
अगर तुम नहीं ठहरे तो तस्वीर में तुम्हारे ऊपर मालाएं होंगी
नादानी छोड़ घर में बैठ जा बस इतनी सी बात है तुम्हारे से
बेहतर कल की तस्वीरें तुम देखते हो आज मगर शांत चित्त
प्रकृति कवि तुम्हें उतना ही प्यार करती जितना तुम मुझसे
आज चारों तरफ खामोशी है तो सिर्फ कुछ मूर्खता कारण
तुम समय पर चेत जाते तो तुम्हें इतनी खामोशी ना होती
क्योंकि तुम्हें सत्ता का सुख चाहिए जनता दुख क्या होता
बेहतर है तुम राजनीतिक हो मानवता के विरोध न लिखो
©lawnishtha
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