जब चुप्पी सड़कों पे बसर करती है,
तब शहर की रोशनी मुस्कुराती है।
कांच के महलों में, छोटी गलियों में,
हर एक कोना जैसे ख्वाब बुनता है।
जहाँ अकेलापन भी मेले लगाता है,
और सन्नाटा कहीं गीत गाता है।
न जाने कितनी निगाहें, खिड़कियों से,
उम्मीदों के दिये रोशन करती हैं।
नीली-नीली छतों तले, ये रोशनी,
किसी कविता की तरह बहती जाती है।
ये शहर की रोशनी, सच में कहें तो,
हर रोज़ एक नई कहानी सुनाती है।