शून्य में भी है वही, इकाई से अनंत तक
सृष्टि सृजन से भी पहले, है प्रलय के अंत तक
प्रचंड में अघोर भी वो, सहजता में संत है
काल से जो है परे, शिव शंभू वो भगवंत है
भष्म देह पर नाग गल में, अर्धचंद्र माथे सजा
त्रिशूल लेकर हाथ में वो, है रहे डमरू बजा
गंगा धारण कर जटा में, बाघंबर धारण किये
नीलकंठ शिव शंकरा, जो सारे विष को है पिये
देवता सारे असुर, दोनो ही जिनको मानते
है त्रिलोकीनाथ शिव, भलीभांति वो पहचानते
वेदों का सार भी वो, पुराणों का ज्ञान है
शिव ही रौद्र रूप और, शिव ही कल्याण है
मुझ में भी शिव तुझ में भी है, शिव रहा शिव में समा
यह प्रकृति शिव ही है, शिव है कण-कण में रमा
हे दीनानाथ दया करके, रख सिर पे अपना हाथ दे
माफ़ कर बालक की ग़लती, तू प्यार भोलेनाथ दे
©sambharwal
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