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सीता की परीक्षा

ना था अपनों का साथ, ना ही गैरो से मुलाकात।
क्या करे जग में बखेरा, जब अपनों ने ही मुँह फेरा।
आखिर उसके दिल के भी थे कुछ अरमान।
क्यों हमेशा सहन करें वो अपमान।
सबसे क्यों उससे मुँह मोड़ा।
नियति ने भी उसका साथ छोड़ा।
चली गयी वो सबको छोड़ ।
अपने नए संघर्ष की ओर।
था उससे सबसे बड़ा प्यार ।
फिर क्यों ली गयी उसकी परीक्षा बार बार।
हो गयी वो सबसे जुदा।
गयी धरती में समा।
©ritika_raj