सिन्धु सदियों से हमारे देश की पहचान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
पेड़-पौधों के हरे पत्तों को चमकाती हुई
फूल पर लेकिन कटोरों रंग ढलकाती हुई
अप्सरा उतरे जमीं पर ऐसे इठलाती हुई
पत्थरों से बात करती बोलती गाती हुई
अपनी लहरों में छिपाए बांसुरी की तान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
चांद तारे पूछते हैं रात भर बस्ती का हाल
दिन में सूरज ले के आ जाता है एक सोने का थाल
खुद हिमालय कर रहा है इस नदी की देखभाल
अपने हाथों से ओढ़ाया है इसे कुदरत ने शाल
कतरा-कतरा इस नदी का फौजियों की शान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
देश के दुख-सुख से इसका आज का रिश्ता नहीं
इसका पानी साफ है शफ्फाफ है खारा नहीं
आपने हैरत है अब तक इस तरफ देखा नहीं
जो सियासत ने बनाया है ये वो नक्शा नहीं
जो हमें कुदरत ने बख्शा है ये वो सम्मान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
सिन्धु को केवल नदी हरगिज न कहना चाहिए
देश की रग-रग में इसको रोज बहना चाहिए
कम से कम एक दिन यहां पर आके रहना चाहिए
जिन्दगी दु:ख भी अगर बख्शे तो सहना चाहिए
जिसने पानी पी लिया है सिन्धु का धनवान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
हर सिपाही दुश्मनों से जंग करता है यहां
जर्रा-जर्रा मौसमों से जंग करता है यहां
जिस्म ठंडी नागिनों से जंग करता है यहां
रोज मौसम हौसलों से जंग करता है यहां
देश पर कुर्बान होना फौजियों की शान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
बर्फ रेगिस्तान है लद्दाख जैसे करबला
बर्फ को पानी बना देता है लेकिन हौसला
नफरतों के बीज बोना है सियासी मशगला
आओ मिल-जुल कर करें हम लोग अब ये फैसला
देश पर दिल भी हमारा जान भी कुर्बान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
इस नदी को देश की हर एक कहानी याद है
इसको बचपन याद है इसको जवानी याद है
ये कहीं लिखती नहीं है मुंह जुबानी याद है
ऐ सियासत तेरी हर एक मेहरबानी याद है
अब नदी को कौन बतलाए ये पाकिस्तान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
रास्ता तकती है सिन्धु ऐसे सर खोले हुए
जैसे कोई रो रहा हो चश्मे तर खोले हुए
जैसे चिड़िया सो रही हो अपने पर खोले हुए
मुनतजिर बेटे की जैसे मां हो घर खोले हुए
जिनके बेटे फौज में हैं उनका ये बलिदान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
था कहां तक देश कल तक ये बताती है हमें
अपने आईने में ये माजी दिखाती है हमें
जान देना मुल्क पर सिन्धु सिखाती है हमें
मां की तरह अपने सीने से लगाती है हमें
जख्म है छाती पे लेकिन होंठ पर मुस्कान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।
संकलनकर्ता
Ashish Prajapati
©poemearth
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