हर शहर में लोग है आंसू बहाने के लिए ।
मिल गयी ख़ैरात जो उसको लुटाने के लिए ।।
अपने जख्मो को छुपाकर घूमता हूं देश मे ।
आएगा कोई नही मरहम लगाने के लिए ।।
देखकर तेरी ऊँचाई खुश नही होगा कोई ।
लोग मौका ढूंढते है काट खाने के लिए ।।
है नही उद्देश्य कोई ना ही कोई आरजू ।
बन गए नेता फ़क़त वो हिनहिनाने के लिए ।।
मिल रहा था पद प्रतिष्ठा बेचकर सम्मान को
मैं नही तैयार था उसको सजाने के लिए ।।
मनोज
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©manojdubey
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