मै संकोची सत्य का मोची
झूठ कहने से घबराता हुँ
पर पता नहीं क्यों हर बार
मैं ही झूठा कहलाता हुँ।
दूसरों को बुरा न लग जाय कही
हरदम इससे घबराता हुँ
पर पता नहीं क्यों हर बार
मैं ही बुरा कहलाता हुँ।
जिंदिगी से सीकायत बहुत हैं
पर किसी से कह न पाता हुँ
पर पता नहीं क्यों हर बार
मैं ही सीकायत बन जाता हुँ।
आँखों में केवल सत्य प्रबल हैं
जिसको छुपा न पाता हुँ
पर पता नहीं क्यों हर बार
मैं ही झूठा कहलाता हुँ।
हरदम अपनी करुणा से
दूसरों को सुखी कर जाता हुँ
पर पता नहीं क्यों हर बार
मैं ही करुणा पात्र बन जाता हुँ।
अपने अंदर की बातो को
मैं खुलकर बतला न पाता हुँ
शायद ! इसी लिए हर बार
मैं ही संकोची कहलाता हुँ
मैं ही झूठा कहलाता हुँ।
धन्यवाद
अभिज्ञान राय
©gyandeep
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