सन्नाटे का सागर

कभी शोर में भी अनसुना,
अकेलापन, दिल का गुबार।
रहे भीड़ में खोया हुआ,
मन की आवाज से हार।

इस सन्नाटे के सागर में,
खुद को ढूंढता हर बार।
भीड़ से दूर, खुद से नज़दीक,
मिलते हैं असली अहसास सार।

रात की चांदनी, सितारों की बातें,
मेरे अकेलेपन के साथी।
जीवन की इस अनबुझ पहेली में,
खुद से मुलाकात वही।

अकेलापन, मेरा सहारा,
खुद से किये वादे का इज़हार।
मेरी कलम, मेरे जज़्बात,
इस एकांत में, मेरे विचारों की उड़ान।