हमसफर हू सफ़र का अपना
गुमसुम तो रहना आता नहीं !
हर पल पसंद करता हूं नदियों सा छपकना।
जो खरा जीवन का मसविदा खाच दे
ढूंढ रहा हूं उन राहों को!
पर, हर दफा नतीजे में
किसी ना किसी उलझन का फलक मिल रही,
क्या करे?
हम चाहकर भी ढूंढ़ना बंद नहीं करते क्योंकि,
हर क़दम दर क़दम मंज़िल की झलक मिल रही।
" तुम्हे लौटना कभी नहीं है " की गूंज
जिंदगी के हर महफ़िल में लगी हैं।
खामोश हूं दुनिया के नज़रों में,
ऐसी आहटे अभी अभी तो दिल में जगी है।
दिहकनियात का परिंदा सो रहा
मेहनत राहों की मलीनता धो रहा,
गुल खी ल रहा मेरे सपनों का
सुख का तना मुरझाने दो।
गुम था जुबान पहले कभी,
उसे उद्देश्य मंत्र फरमाने दो।
©Nilesh K
N