छल छल कैसा कपट,काट लिया अंगूठा एकलव्य का।
सिंह जैसा जो कर्ण दहाड़ा,छीन लिया कवच कुंडल उसका।
ना जाने द्रोण ने,कितना पाप कमाया,तब जाकर अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ बनाया।
यही गति थी,यही विधि थी,उस पल भी और आज,
बातें करते सर्वश्रेष्ठ की,बस मिथ्या का आभास।
रण में लड़ते भीष्म पितामह,बन कोरवों का आधार।
शिखंडी को आगे करके,छुप छुप करता,सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर उन पर वार।
होते छलनी भीष्म पितामह, हो जाता कर्ण का संहार,
साथ देते दुर्जन का,और फिर सुयोधन दुर्योधन कहलाय।
एकलव्य बिन अंगुठा तीर चलाता, शिक्षा दिए बिना द्रोण, गुरु दक्षिणा ले जाता।
ज्येष्ठ भ्राता कर्ण कहलाता सुतपुत्र,और अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाता।
©
©abhayt
A