चलो दो पल ज़रा इस सत्य को भी जांच लें
देश की और स्वयं की गहराई को भी माप लें।
स्वयं के अवगुणों को जान लेना ही तो ज्ञान है
दर्पण में निसंकोच देखना वीर की पहचान है।
मगन था भुवन जब विकास में भगदड़ में
मनुष्य था यूँ झुंका हुआ मानो अदृश्य से रण में।
सहसा एक जीवाणु प्राणों पर प्रकोप बन आया
ठहर गया मनुज का जीवन तनिक ना मांगे माया।
किसने जाना था मनुष्य इस दुर्गति को जाएगा
मरने पर परिवार लिपट के रो भी ना पाएगा।
कितने हुए शिकार न जाने कितनों की बारी है
मरी माँ के संग खेलती बच्ची बेचारी है।
सुनते थे कि देश हमारा है बहुत गतिमान
भूमंडल की पांचवी अर्थव्यवस्था इसका नाम।
सुनते थे हैं नौ महीने को भरे हुए भंडार
बीस दिवस में बोलो क्यों मच गया ये हाहाकार।
करना पड़ा पलायन क्यों हम भोजन ना दे पाए
इतने पर भी हिन्दू-मुस्लिम से हम बाज़ न आये ।
मगर रात्रि के बाद सवेरा होना तो निश्चित है
झुका सके मनुज को , किसमें वो शक्ति अंकित है।
किन्तु है यह अवसर अपने भीतर खोज करो तुम
ढूंढो ऐसी राह प्रसन्न हो जिसपर चल सको तुम।
सीमित रहने पर तो तुम चैतन्य न हो पाओगे
धर्म-जाति की अधम दीवारें तोड़ नहीं पाओगे।
नए दौर का शत्रु तो यह भेद नही करता है
मानो पूछ रहा हो क्यों तू बेमतलब लड़ता है।।
©shivampara
©parashar
P