सुबह की पहली किरण

जब सुबह की पहली किरण
धीरे से आँखों पर खेले,
वह समय जब दुनिया अभी भी सोई है
पर ख्वाब हमारे जाग चुके होते हैं।

उस खामोशी के पल में,
चाय की एक प्याली आती है,
जैसे कहानियों की बूँदें,
अपनी उंगलियों को भिगोजा करती हैं।

वह गर्माहट, वह अरोमा,
जैसे एक पुराना दोस्त,
सब कुछ कह देने को आतुर,
बिना शब्दों का साथ देता है।

और तो और, पहली घूंट में,
मिल जाता है दिन का मकसद,
जैसे चाय के जादू में,
छुपी हो जिंदगी की कोई अनकही सी सीख।

सुबह की चाय में नहीं होता बस उबाल,
इसमें बसती है उम्मीदों की खुशबू,
हर रोज़ एक नयी शुरुआत का पैगाम,
और दिलों को जोड़ने का एक मीठा इल्जाम।