सुबह का आगाज़ वो चाय की प्याली,
जैसे सूरज की पहली किरण से उजाली।
भाप से खेलते ख़्वाब, अरोमा से जगते अहसास,
इसका स्वाद ले, खोलता जीवन के ख़ास राज़।
कुछ बिस्कुट डूबे, तो कुछ बातें तैर गईं,
सिप में छुपी यादें, मन की पेचीदगियां बैरंग हो गईं।
चाय की वो आख़िरी घूँट ने धीरे से कहा,
"इस सुबह को अपना बना, जीवन में रंग भरा।"