जब आशा निराशा में बदल जायें,
जब परिश्रम भी व्यर्थ में चला जायें ।
तब कदम लड़खड़ाते है ।।
जीत के लिए जब मन मचलता है,
और हम जब उत्साह के साथ चलते है ।
लेकिन तब हम हार जायें तो,
तब कदम लड़खड़ाते है ।।
अकेले लड़ते है जब हम मैदानो में ,
सफलता के लिए जान की बाजी लगा दे ।
लेकिन तब हमारे हितैषी साथ छोड़ दे तो,
तब कदम लड़खड़ाते ।।
रात मे दोस्तो के साथ चल रहे हो,
चारो तरफ से धोखा मिल रहा हो ।
फिर शत्रुओ के वार होने लगे तो,
तब कदम लड़खड़ाते है ।।
तारो की तरह सपने टूट जायें,
दौड़ में जीत से एक कदम चूक जायें तो ।
तब कदम लड़खड़ाते है ।।
सुरेंद्र सिंह "भाटी "
©jalamsingh
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